आप वेदों के विद्वान् हैं , आज के युग में वेद के विचारों से दुनियाँ का क्या भला हो सकता है ?

            डॉ. मोक्षराज -वेद तीनों काल में प्रासंगिक हैं। भारत की प्राचीनतम सभ्यता व संस्कृति वेदों पर ही आधारित हैं । संसार के कल्याण के लिए आर्यावर्त्त  के ऋषि मुनियों ने तप त्याग व गहन साधना का आश्रय  लिया तथा  वे जीवन का  सर्वस्व लोक हित   के लिए ही अर्पित कर गये । वैदिक  परम्परा  आरंभ से ही आकाश,वायु, अग्नि,  जल, पृथ्वी, वृक्ष- वनस्पति, पशु- पक्षी  व समस्त भूमण्डल पर जितने जीव हैं  उन सबका रक्षण,पोषण व मंगल की कामना करती है। यजुर्वेद का मंत्र है - ओ३म् द्यौशान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति: पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति: वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्मशान्ति: सर्वँ शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि अर्थात् |qलोक (सूर्य का स्थान) अन्तरिक्ष, पृथ्वी, जल, औषधियाँ ये सभी अपने प्राकृतिक गुणों को धारण करते हुए ऐसा संतुलन व सामर्थ्य बनाए रखें , जिससे समस्त प्राणियों को अगाध सुख  शांति प्राप्त होती रहे । वनस्पतियाँ, अग्नि, विद्युत्  आदि जड़ पदार्थ तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, निषाद आदि सभी योग्यताओं वाले मनुष्य सुख, शांति व आनंद को धारण करें एवं उनकी शांत अवस्था सकल भुवन में वृद्धि व समृद्धि का आधार बनें । सबके हित के लिए की गयी  ऐसी प्रार्थनाएँ सभी वेदों में हैं। इन लोककल्याणकारिणी  प्रार्थनाओं में किसी देश, जाति, संप्रदाय का भेदभाव नहीं है । इस प्रकार के विचारों से ही संसार का उपकार संभव है।

डॉ. मोक्षराज -जो सोचा है उसे काम करके ही प्रमाणित करेंगे। लेकिन  इतना अवश्य है कि हम  वसुधैव कुटुम्बकम् की विचारधारा को बढ़ाना चाहते हैं ।  हमें अपने पूर्वजों पर गर्व है , जिन्होंने सम्पूर्ण संसार के आरंभ  में सबके लिए हितकारी संस्कृति व सभ्यताएं सँजो कर रखीं। सम्पूर्ण भूमंडल के लोग हमारे भाई बहिन हैं , यह सिखाने वाले पूर्वजों ने हमें निःस्वार्थ भाव से सबका भला करना सिखाया है । मैं तो चाहूँगा कि सम्पूर्ण विश्व के मनीषियों को उसी मूल संस्कृति की खोज में निष्पक्षता से लगना चाहिए जो सबको निर्भयता, सच्चरित्रता, सादगी, प्रकृति-प्रेम व समस्त प्राणियों में दया का भाव जागृत करती हो। जो संस्कृति सुख, आपसी प्रेम व सद्भाव से सबको जीने का अधिकार देती हो।  जिस संस्कृति ने 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 53 हजार बर्ष पहले सम्पूर्ण विश्वपरिवार की परिकल्पना दी।- यत्र विश्वं भवत्येकनीडम् - यजुर्वेद                       

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