अघोरपंथ साधना की एक शाखा है. शमशान में तंत्र किया करने वाले बाबा को अघोरी बाबा कहते है. अघोरी बाबा का इतिहास एक हजार वर्ष पुराना है. उस समय वाराणसी में अघोरियों का जन्म हुआ था लेकिन आज इनकी संख्या काफी कम हो चुकि है।

 

अघोरियों की सबसे पहली पहचान यही है कि वे किसी से कुछ नहीं मांगते है और दूसरा यह कि वे जल्दी से दिखाई नहीं देते। शमशान में रहने वाले अघोरी साधुओं को कुंभ में देखा जा सकता है

अघोरी साधुओं का शिव का रूप कहा जाता है. इसलिए यह भी मान्यता है, कि अघोरी कलयुग में पृथ्वी पर भगवान शिव का जीवित रूप हैं. शिवजी के पांच रूपों में से अघोर एक रूप है. अघोरियों के बारे में हमेशा से ही लोगों की जिज्ञासा रहती है. लेकिन ये आम इंसान से दूरी बनाये रखते है. और ये साधु भांग-धतूरे के नशे में रहते हैं. इन्हें जीवन यापन करने के लिए किसी सुख-सुविधा की जरूरत नहीं होती।

सभी तरह के वैराग्य को प्राप्त करने के लिए ये साधु श्मशान में कुछ दिन गुजारने के बाद हिमालय या जंगल में चले जाते हैं. और अघोरी बाबा की आंखें लाल सुर्ख होती हैं. इनकी आंखों में जितना क्रोध दिखाई देता है, बातों में उतनी ही शीतलता होती है. अघोरी साधना तीन प्रकार की होती है. यानी अघोरी साधु श्मशान में तीन तरह की साधना करते हैं. पहली श्मशान साधना, शव साधना और तीसरी शिव साधना करते हैं

ऐसी मान्यता है, कि शव साधना के बाद बाद मुर्दा भी बोल उठता है, और आपकी इच्छाएं पूरी करता है. शिव साधना में शव के ऊपर खड़े रहकर साधना की जाती है. शमशान साधना में परिजनों को भी शामिल किया जा सकता है।

Close Menu