Monday , April 23 2018
Breaking News
Home / आध्यात्म / वसुधैव कुटुम्बकम्” तथा “जीयो और जीने दो” की संस्कृति का केन्द्र है, भारत

वसुधैव कुटुम्बकम्” तथा “जीयो और जीने दो” की संस्कृति का केन्द्र है, भारत

आप वेदों के विद्वान् हैं , आज के युग में वेद के विचारों से दुनियाँ का क्या भला हो सकता है ?

            डॉ. मोक्षराज -वेद तीनों काल में प्रासंगिक हैं। भारत की प्राचीनतम सभ्यता व संस्कृति वेदों पर ही आधारित हैं । संसार के कल्याण के लिए आर्यावर्त्त  के ऋषि मुनियों ने तप त्याग व गहन साधना का आश्रय  लिया तथा  वे जीवन का  सर्वस्व लोक हित   के लिए ही अर्पित कर गये । वैदिक  परम्परा  आरंभ से ही आकाश,वायु, अग्नि,  जल, पृथ्वी, वृक्ष- वनस्पति, पशु- पक्षी  व समस्त भूमण्डल पर जितने जीव हैं  उन सबका रक्षण,पोषण व मंगल की कामना करती है। यजुर्वेद का मंत्र है – ओ३म् द्यौशान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति: पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति: वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्मशान्ति: सर्वँ शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि अर्थात् |qलोक (सूर्य का स्थान) अन्तरिक्ष, पृथ्वी, जल, औषधियाँ ये सभी अपने प्राकृतिक गुणों को धारण करते हुए ऐसा संतुलन व सामर्थ्य बनाए रखें , जिससे समस्त प्राणियों को अगाध सुख  शांति प्राप्त होती रहे । वनस्पतियाँ, अग्नि, विद्युत्  आदि जड़ पदार्थ तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, निषाद आदि सभी योग्यताओं वाले मनुष्य सुख, शांति व आनंद को धारण करें एवं उनकी शांत अवस्था सकल भुवन में वृद्धि व समृद्धि का आधार बनें । सबके हित के लिए की गयी  ऐसी प्रार्थनाएँ सभी वेदों में हैं। इन लोककल्याणकारिणी  प्रार्थनाओं में किसी देश, जाति, संप्रदाय का भेदभाव नहीं है । इस प्रकार के विचारों से ही संसार का उपकार संभव है।

डॉ. मोक्षराज -जो सोचा है उसे काम करके ही प्रमाणित करेंगे। लेकिन  इतना अवश्य है कि हम  वसुधैव कुटुम्बकम् की विचारधारा को बढ़ाना चाहते हैं ।  हमें अपने पूर्वजों पर गर्व है , जिन्होंने सम्पूर्ण संसार के आरंभ  में सबके लिए हितकारी संस्कृति व सभ्यताएं सँजो कर रखीं। सम्पूर्ण भूमंडल के लोग हमारे भाई बहिन हैं , यह सिखाने वाले पूर्वजों ने हमें निःस्वार्थ भाव से सबका भला करना सिखाया है । मैं तो चाहूँगा कि सम्पूर्ण विश्व के मनीषियों को उसी मूल संस्कृति की खोज में निष्पक्षता से लगना चाहिए जो सबको निर्भयता, सच्चरित्रता, सादगी, प्रकृति-प्रेम व समस्त प्राणियों में दया का भाव जागृत करती हो। जो संस्कृति सुख, आपसी प्रेम व सद्भाव से सबको जीने का अधिकार देती हो।  जिस संस्कृति ने 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 53 हजार बर्ष पहले सम्पूर्ण विश्वपरिवार की परिकल्पना दी।- यत्र विश्वं भवत्येकनीडम् – यजुर्वेद                       

About Kishor Solanki

Co-Editor at MarudharaTimes.com

Check Also

https://i2.wp.com/babybrainmemoirs.com/wp-content/uploads/2015/12/image.jpeg

गुरुपर्व के मौके पर गुरुद्वारों में उमड़ी भीड़

चंडीगढ़। पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में शनिवार को गुरुपर्व के मौके पर गुरुद्वारों में …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

11 + 6 =