Monday , April 23 2018
Breaking News
Home / ब्लॉग / एससी-एसटी कानून पर सार्थक बहस हो

एससी-एसटी कानून पर सार्थक बहस हो

( डाॅक्टर आलमगीर ) – डाॅक्टर भीमराव अम्बेडकर ने कहा था ‘‘यदि मुझे लगा कि संविधान का दुरुपयोग किया जा रहा है तो इसे सबसे पहले मैं जलाऊंगा’’। एससी-एसटी (प्रताड़ना निरोधक) कानून पर सर्वोच्च न्यायालय का दिया गया हालिया फैसला बाबा साहब की इस उक्ति के अनुरूप है। इसके दुरुपयोग की बढ़ती शिकायतों के मद्देनजर सप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के सुभाष काशीनाथ महाजन केस पर दिए गए अपने फैसले में तत्काल प्राथमिकी दर्ज करने और तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। 
असल में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (प्रताड़ना निरोधक) कानून 1889 में लागू होने और फिर 1995 में इस विशेष कानून के तहत बने सख्त नियमों के बाद से ही बहस का विषय रहा है।
उच्च जाति के लोग इसे दलितों के जरिए निजी स्वार्थों और राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल किए जाने के आरोप लगाए जाते रहे हैं। उनके ये आरोप निराधार भी नहीं है। इसकी वजह ये है कि इसमें आरोपी के खिलाफ फौरन एफआईआर दर्ज होने और तत्काल गिरफ्तारी का प्रावधान है। यही नहीं इस कानून की धारा 18 के तहत आरोपी की अग्रिम जमानत भी नहीं हो सकती है। ये धारा भारतीय दंड संहिता के अनुच्छेद 438 के विरुद्ध है जिसमें आरोप साबित होने तक अग्रिम जमानत का प्रावधान है। यही वजह है कि दलित उत्पीड़न जैसी घोर सामाजिक बुराई को समाप्त करने के लिए बना ये कठोर कानून अपने हित साधने जैसी एक दूसरी सामाजिक कुरीति को बढ़ावा देने लगा। इसकी नजीरें जब-तब सामने आती हैं। विशेषकर उत्तर प्रदेश में एक विशेष पार्टी के सत्ता में आते ही कभी पट्टे की जमीनों तो कभी मामूली कहासुनी जैसे विवादों को लेकर इस कठोर कानून के गलत इस्तेमाल से सम्बंधित मामलों की बाढ़ सी आ जाती है।
नेशनल क्राइम रिकाॅर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े भी एससी-एसटी कानून के दुरुपयोग की कहानी बयान करने के लिए काफी हैं। एनसीआरबी के अनुसार 2016 में इस कानून के तहत राष्ट्रीय स्तर पर दर्ज हुए कुल मामलों में महज 15.4 प्रतिशत ही सजा के पात्र पाए गए। इसी तरह सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के 2015 के आंकड़ों के अनुसार दलित प्रताड़ना के कुल 15638 मामलों पर अदालत में सुनवाई हुई जिनमें से 11024 को या तो निरस्त कर दिया गया या फिर आरोपी बरी कर दिए गए। 495 मामले वापिस ले लिए गए और केवल 4119 मामलों में ही आरोपियों को सजा हुई। सजा की इतनी कम दर से साबित होता है कि दलित प्रताड़ना निरोधक कानून के तहत दर्ज हुए अधिकतर मामले या तो फर्जी साबित हुए या फिर अभियोजन पक्ष उन्हें साबित करने में नाकाम रहा।  
ये भी एक तल्ख हकीकत है कि इतने कठोर कानून की व्यवस्था होने के बावजूद देश में न तो दलित उत्पीड़न के मामलों में कमी आई है और न ही यह दलितों के प्रति लोगों का नजरिया बदलने में सफल रहा है। मतबल साफ है कि एससी-एसटी कानून लक्षित उद्देश्यों की पूर्ति करने में नाकाम रहा है। इसीलिए जस्टिस यूयू ललित और आदर्श गोयल की दो सदस्यीय खण्डपीठ को अपने फैसले में कहना पड़ा कि कोई भी कानून स्वार्थों की पूर्ति के लिए बेकसूर लोगों और लोकसेवकों को सजा दिलाने का हथियार नहीं बनना चाहिए। काबिलेजिक्र है कि दोनों जजों की ये वही खण्डपीठ है जिसने दहेज उत्पीड़न मामलों में भी जिला स्तरीय समिति बनाने की वकालत की थी। एससी-एसटी कानून के इस बेजा इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इससे सम्बंधित शिकायत मिलने पर तत्काल प्राथमिकी दर्ज नहीं होगी बल्कि इसकी जांच होगी कि कहीं मामला फर्जी या दुर्भावना से प्रेरित तो नहीं है। इसके साथ ही कोर्ट ने अभियुक्त की तत्काल गिरफ्तारी पर भी रोक लगा दी है। अदालत ने कहा है कि सामान्य व्यक्ति की गिरफ्तारी से पहले एसएसपी की मंजूरी और सरकारी कर्मचारी की गिरफ्तारी से पहले सक्षम अधिकारी की मंजूरी लेनी होगी। इसी तरह अदालत ने दूसरे मामलों की तरह इसमें भी अग्रिम जमानत का रास्ता खोल दिया है।
उच्चतम न्यायालय का ये निर्णय संविधान रचयिता डाॅक्टर भीमराव अम्बेडकर के उस कथन को साकार करने जैसा है जिसमें उन्होंने कहा था ‘‘कानून-व्यवस्था राजनीति शरीर की दवा है और जब राजनीतिक शरीर बीमार पड़ जाए तो उसे दवा अवश्य देनी चाहिए’’। इस फैसले की पीछे सुप्रीम कोर्ट की पूरी कवायद एससी-एसटी कानून का दुरुपयोग रोकना है। इसपर कांग्रेस समेत दीगर कई विपक्षों दलों और दलित संगठनों ने व्यर्थ की बहस छेड़ दी है कि केंद्र सरकार अदालत के सामने इस कानून पर मजबूती से अपना पक्ष रखने में नाकाम रही। इसीलिए दलितों के अधिकारों की रक्षा करने वाले इस कानून में प्रदत्त प्रावधानों में उच्चतम न्यायालय को परिवर्तन करना पड़ा। 

Dr. Alamgeer Assistant Professor (Media Faculty)

Hindi department ,Jamia Millia Islamia

सत्तारूढ़ एनडीए के कुछ सहयोगियों ने भी इसका विरोध किया है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले ने तो इसके लिए बाकायदा एक मुहिम छेड़ दी है जिसपर केंद्र सरकार को भी सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय पर विचार करने की बात कहनी पड़ी है। असल दिक्कत यही है कि हर मुद्दे की तरह इसको भी दलित अधिकार से ज्यादा राजनीतिक नफा-नुकसान के नजरिए से देखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट का मकसद इस कानून के दुरुपयोग को रोकना मात्र है। अलबत्ता इस फैसले के कई बिंदुओं पर सार्थक बहस की गुंजाइश है। मसलन तत्काल एफआईआर, गिरफ्तारी और अग्रिम जमानत को लेकर अदालत ने ‘सक्षम अधिकारियों’ से अनुमति की जो शर्तें लगाई हैं, उससे हमारे पुलिसिया तंत्र और समाज में ऊंचा मकाम रखने वाले उच्च जाति के लोगों के बीच एक गठजोड़ बनने की संभावना है। सभी जानते हैं कि रसूख रखने वाले अभियुक्तों को बचाने के लिए इनके द्वारा किस तरह के षडयंत्र रचे जाते हैं। फिर इतने कठोर कानून होने के बावजूद जब दलित उत्पीड़न के मामलों में अभियुक्तों के बरी होने की दर इतनी है तो अग्रिम जमानत मिलने या फिर इन प्रावधानों के लचीला होने इसके मजीद बढ़ने का खतरा है। 
हमारी सुस्त न्यायिक प्रक्रिया की वजह से देश की अदालतों में वैसे ही करोड़ों मामले विचाराधीन हैं। दलित और दहेज उत्पीड़न जैसे मामलों के दुरुपयोग को रोकने के लिए उसकी विभिन्न स्तरों पर प्रमाणिकता जांचने से इसकी रफ्तार और सुस्त पडने का खतरा है। देखा जाए तो इस कमजोरी की जड़ कहीं न कहीं कमजोर पुलिसिया और जांच तंत्र ही है। ऐसे में राजनीतिक दलों को बहस इस पूरे तंत्र को मजबूत के लिए करनी चाहिए। शोषित और कमजोरों के हितों की रक्षा करना संसद का मकसद तो होना चाहिए लेकिन उसके लिए न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता के साथ समझौता भी नहीं होना चाहिए। 

About MT Desk

Check Also

राम जन्मभूमि है राष्ट्रभावना का प्रतिक

भारतीय राष्ट्रभाव का चरम आनंद है,वे मंगल भवन है,अमंगलकारी है,मर्यादा पुरुषोत्तम है। वे भारतीय मानस …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

19 − eighteen =