नई दिल्ली (मोहम्मद शहजाद ) -इस्लामी खानदान की इब्तेदा निकाह से होती है। इसमें बंध जाने के बाद मर्द और औरत, जीवनभर के लिए एक दूसरे के साथी बन जाते हैं। यही नहीं इस्लाम में शादी को एक खूबसूरत एहसास करार दिया गया है। ऐसे में भला इतने पवित्र बंधन को इस्लाम एक झटके में तोड़ने की इजाज़त कैसे दे सकता है? एक तरह से देखा जाए तो लोकसभा से मुस्लिम महिला बिल यानी ट्रिपल तलाक बिल को मंजूरी मिलना मजहबी व्याख्या की इस लाइन के ठीक अनुरूप ही है। पार्लियामेंट के निचने सदन से बिल के पारित होने से मुस्लिम महिलाओं को चांद तो नजर आ गया है लेकिन उनकी असल ईद तो इसे राज्य सभा से मंजूरी मिलने के बाद ही होगी।

इसे कानूनी रूप ले लेने के बाद महज मेहर की सांकेतिक रकम अदा करके मुस्लिम मर्द इतने सस्ते में नहीं छूट सकेंगे। उन्हें तलाकशुदा बीवी और बच्चे को गुजारा भत्ता देना पड़ेगा। इस तरह एक को छोड़ कर दूसरी से निकाह कर लेने की प्रवृत्ति कम होगी। फिर जेल काटने के डर से भी एक झटके में सम्बंध-विच्छेद करने से पहले दस बार सोचेंगे।

चार माह पहले 22 अगस्त को जब सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने अपने फैसले में एक साथ तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया गया था तभी इसकी राहें हमवार हो गई थीं। 3-2 के मुकाबले आए इस फैसले में बस तत्कालीन मुख्य न्यायधीश जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस एस अब्दुल नजीर का इस मामले में मत भिन्न था। उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत इसे संवैधानिक संरक्षण प्राप्त होने की बात तो की थी लेकिन तलाके-बिद्दत से निपटने के लिए उन्होंने भी संसद के जरिए उचित कानून बनाए जाने की वकालत की थी। यानी पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ के सभी जज इसके खिलाफ संसद के जरिए कानून पारित कराने को लेकर एकमत थे।

मुस्लिम महिलाओं समेत तमाम बुद्धिजीवियों और उलेमाओं के कई संगठनों ने भी सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले का तहे-दिल से स्वागत किया था। एक साथ तीन तलाक की कुप्रथा को खत्म करने का कोई भी प्रयास निःसंदेह स्वागतयोग्य है। अलबत्ता केंद्र सरकार के जरिए जिस तरह से इसे लोकसभा से पारित कराने की कोशिश की गई, उस पर सवाल उठना लाजमी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कुरान पाक में एक साथ तीन तलाक का कोई वर्णन नहीं है। इसके लिए बाकायदा एक समयावधि जिसमें औरतों के तीन तहूर यानी मासिक धर्म की तीन मियाद के साथ-साथ गवाहों तक का प्रावधान है। फिर जाने कैसे एक साथ तीन तलाक की कुप्रथा भारतीय उपमहाद्वीप में चल पड़ी? जाहिर है कि ये ऐसी एक समाजी कुरीति थी जो पितृ-सत्ता सोच से प्रेरित थी। चूंकि ये भारत में सदियों से जारी है, इसलिए इसे खत्म करने की ठोस पहल होनी चाहिए। ऐसे में केंद्र सरकार की मंशा पर ये सवाल उठता है कि आखिर वो इसको लेकर इतनी हड़बड़ी में क्यों है?

शाह बानो पर आए फैसले को लेकर कभी मुसलमान मर्दों को मुस्लिम पर्सनल लॉ का हथियार देने वाली कांग्रेस भी मुस्लिम महिला बिल का कोई मुखर विरोध नहीं कर रही है लेकिन इस मामले में आरजेडी, एआईएमआईएम, बीजू जनता दल और एआईएडीएमके जैसे विपक्षी दलों के विरोध को संज्ञान में लेने की आवश्यकता है। विशेषकर उनके इस विरोध में दम है कि इसे सदन से पारित कराने से पहले स्थाई समिति को भेजा जाना चाहिए ताकि इसके विभिन्न पहलुओं पर व्यापक विचार-विमर्श हो सके। इसके बिल में अगर किसी तरह की त्रुटियां रह गई हैं तो उन्हें दूर करने में मदद मिलेगी। मसलन मुस्लिम महिला बिल में एक साथ तीन तलाक के आरोपियों को तीन साल तक की सजा का प्रावधान है। इससे मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के ऐतराज में दम नजर आता है कि जब तीन तलाक देने वाला व्यक्ति जेल में होगा तो अपने बीवी-बच्चे का गुजारा भत्ता देने में कैसे सक्षम होगा।

मुस्लिम महिला बिल के इस तरह के कई दीगर बिंदुओं पर ध्यान देने की जरूरत है। असल में इस्लाम में तलाक की अनुमति बहुत ही विपरीत परिस्थितियों में दी गई है। कुरान शरीफ में स्पष्ट उल्लेख है कि तलाक से पहले दोनों पक्षों के परिवार वालों को शामिल करके समझौता कराने, बिस्तर अलग करने और चेतावनी देने जैसे कई उपाय अपनाए जाने चाहिए। इसके बावजूद अगर शादी एक खुशनुमा एहसास के बजाए बदनुमा रिश्ता बन जाए तब तलाक का विकल्प आता है। अर्थात जब एक दूसरे के जिंदगी जीना मुहाल लगने लगे तब इस्लाम ने दोनों को अलग होने की इजाजत दी है। उसमें भी औरत के गर्भवती होने पर उसे घर से नहीं निकालने और मेहर अदा करके उचित तरीके से विदाई का प्रावधान है। इस तरह से देखा जाए तो ये अत्यंत विपरीत परिस्तिथियों में दी गई एक सहूलत है। इसका किसी भी सूरत में गलत इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि दहेज कानूनों की तरह तीन तलाक कानून का गलत इस्तेमाल नहीं होगा?

इधर समाज में ऐसे कई उदाहरण देखने में आ रहे हैं जहां दहेज कानूनों को महज आपसी झगड़े का बदला लेने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें पुरूषों को वर्षों तक कानून की जटिल प्रक्रिया का सामना करना पड़ता है। फिर हमारे देश में न्याय मिलने में जिस तरह देरी होती है, उससे इस तरह के मामले सामने आने से न्यायपालिका पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की पूरी संभावना है। ऐसे में इस कानून को अमलीजामा पहनाने से पहले इसपर व्यापक बहस और विचार-विमर्श की दरकार है।

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