पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जब से आरएसएस के न्यौते पर हां की थी तब से उनके नजदीकी और उनके धुर विरोधी- सभी के दिलों में धुक धुकी थी.

वैसे ये धुक धुकी तो बीजेपी और आरएसएस में भी थी और ये डर वाजिब भी था. प्रणब मुखर्जी कांग्रेस के वरिष्ठतम नेताओं में से एक हैं. भले ही वो पूर्व राष्ट्रपति होने के बाद अपने आप को सामान्य नागरिक माने लेकिन उनकी पहचान कांग्रेस नेता के रूप में ही होती है. ऐसे में संघ मुख्यालय जाना, ये कांग्रेस के लिए डरने वाली बात थी. क्योंकि ये बात तो सब जानते हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी संघ के कटु आलोचक हैं.

और शायद आरएसएस भी कहीं ना कहीं यहीं करना चाहती थी. वो कांग्रेस को डराना चाहती थी और साथ ही कांग्रेस के वरिठष्तम नेता और पूर्व राष्ट्रपति को अपने कार्यक्रम में बुला कर ये भी साबित करना चाहती थी कि संघ का विरोध सिर्फ गांधी परिवार करता है. पूरी कांग्रेस पार्टी नहीं.

पर भाषण शुरू होने तक कांग्रेस में सबको एक ही डर सता रहा था कि क्या बोलेंगे प्रणब दा. और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जब आरएसएस प्रचारकों के दीक्षांत समारोह में राष्ट्रवाद पर संबोधन किया, तो सब लोगों ने राहत की सांस ली. प्रणब दा ने राष्ट्र और राष्ट्रवाद पर कहा कि संविधान के प्रति देशभक्ति ही असली राष्ट्रवाद है. उन्होंने कहा कि सिर्फ़ एक धर्म, एक भाषा भारत की पहचान नहीं है, संविधान से राष्ट्रवाद की भावना बहती है.

मुखर्जी ने आगे कहा कि आज लोगों में गुस्सा बढ़ रहा है, हर रोज़ हिंसा की ख़बर सामने आती रहती हैं, हिंसा और ग़ुस्सा को छोड़कर हमें शांति के रास्ते पर चलना चाहिए. सबसे मज़े की बात थी कि उन्होंने संक्षिप्त में भारत का इतिहास भी पढ़ाया और संघ मुख्यालय के मंच से सरसंघचालक की उपस्थिति में नेहरू और गांधी के दर्शन का पाठ पढ़ाया.

उन्होंने विविधता में एकता की बात भी कहीं और खुशहाली सूचकांक के बहाने सरकार को भी खुशहाल लोगों की ज़रूरत की बात समझाई. अपने भाषण से उन्होंने सबको ख़ुश कर दिया. कांग्रेस इस बात पर ख़ुश हो गई कि उन्होंने संघ के मुख्यालय पर जाकर उन्हें नेहरू गांधी का पाठ पढ़ाया. संघ इसलिए ख़ुश हो गया कि पूर्व राष्ट्रपति के भाषण से ठीक पहले संघसरचालक मोहन भागवत ने भी विविधता में एकता की बात कही थी और प्रणब मुखर्जी के भाषण ने उस पर प्रासंगिकता की मोहर लगा दी.

प्रणब मुखर्जी के राजनैतिक इतिहास को जानने वाले लोगों का मानना है कि उनके राजनैतिक अनुभव को नजरअंदाज़ नहीं करना चाहिए. आरएसएस ने जब अपने कार्यक्रम में कांग्रेसी बैकग्राउंड वाले पूर्व राष्ट्रपति को बुलाया तो वो ये साबित करना चाहते थे कि संघ अपना आधार प्रतिष्ठित और अनुभवी शख्सियतों के माध्यम से मज़बूत करना चाहता है.

जाहिर है प्रणब दा ने सोच समझ कर ही ये कदम उठाया है. इतना तो सब मानते हैं कि प्रणब इतने मंझे हुए नेता तो हैं ही कि वो संघ को अपना इस्तेमाल नहीं करने देंगे. संघ का न्योता स्वीकार करने से कांग्रेस के कुछ नेताओं के माथे पर बल पड़ना तय था ख़ासतौर से तब जब सब जानते हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी संघ को सख़्त नापंसद करते हैं.

उनकी अपनी बेटी ने उनके संघ मुख्यालय में जाने का विरोध किया लेकिन बावजूद इसके प्रणब मुखर्जी ना सिर्फ़ मुख्यालय के कार्यक्रम में शिरकत की और तो और उन्होंने ऐसा भाषण दिया कि कांग्रेस ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेस कर के उनके भाषण का समर्थन किया.

कांग्रेस का डर का एक कारण ये भी था कि उन्हें प्रणब दा की नाराजगी मालूम है. इतिहास में ऐसे दो मौके आए जब प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला लेकिन पार्टी ने दोनो बार उन्हें मौका ना देकर उनके जूनियर नेताओं को मौका दिया.

पहली बार जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी तब वरिष्ठतम नेता होने के नाते उन्हें उम्मीद थी कि उन्हें मौका दिया जाएगा लेकिन तब राजीव गांधी को मौका मिला और दूसरी बार 2004 में जब कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनी तो सोनिया गांधी ने उनके बजाय मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया.

प्रणब मुखर्जी ने इसका जिक्र बाकायदा अपनी किताब में किया और सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की उपस्थिति में मंच पर इस बात को बोला.

कांग्रेस को डर था कि प्रोग्राम में उनका भाषण कहीं पार्टी की किरकिरी न कर दे. वैसे भी प्रणब दा काफी प्रोफेशनल हैं, जिस पार्टी में भी रहे, उसके लिए कभी असहज जैसी स्थिति पैदा नहीं की. यहां तक कि विरोधी भी उनका सम्मान करते हैं. खुद शिवसेना ने राष्ट्रपति पद पर उनकी उम्मीदवारी को समर्थन किया था. जबकि मोदी तो कई बार उनकी तारीफ़ कर चुके हैं.

अब सवाल ये उठता है कि प्रणब मुखर्जी की सक्रियता के मायने क्या हैं?

प्रणब मुखर्जी ने कबीर की तरह दोनों को राह दिखाई है. संघ से कांग्रेस घृणा करती है और संघ नेहरू परिवार को टारगेट करता है. प्रणब दा ने दो धुर विरोधी ताकतों में संवाद की स्थिति की तैयारी तो कर दी है. इसके अलावा ये भी कहा जा रहा है कि प्रणब मुखर्जी राजनीति में अपनी प्रासंगिकता को ख़त्म नहीं करना चाहते थे.

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